लखनऊ। ‘ई-पुस्तिका स्वरूप में ऐतिहासिक निर्णय’ के छठवें संस्करण में ऐतिहासिक मामले ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन अलायन्स व अन्य बनाम एस. हरीश व अन्य’ में माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्णय दिनांक 23 सितंबर, 2024 का हिंदी अनुवादित ई-पुस्तिका प्रकाशित की गई।
ई-पुस्तिका का प्रकाशन माननीय एआई असिस्टेड लीगल ट्रांसलेशन एडवाइजरी, ई-एएचसीआर एवं आईएलआर समिति द्वारा दिनांक 30 सितंबर, 2026 को किया गया। यह श्रृंखला कानूनी शोधकर्ताओं, अधिवक्ताओं, न्यायिक अधिकारियों और विधि के छात्रों के लिए अमूल्य सामग्री साबित होगी।
यह निर्णय बच्चों के अधिकार और डिजिटल सुरक्षा के लिए एक बड़ी विजय है। भारत के उच्चतम न्यायालय ने इस ऐतिहासिक मामले में निर्णायक फैसला सुनाते हुए स्थापित किया है कि केवल डाउनलोड करना, देखना या बाल-संबंधी अश्लील सामग्री को संग्रहीत करना भी भारतीय कानून के तहत एक आपराधिक अपराध है।
न्यायपीठ जिसमें भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायमूर्ति माननीय डी.वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला शामिल थे, ने स्पष्ट रूप से मद्रास हाईकोर्ट के एक विवादास्पद आदेश को पलट दिया, जिसने पहले इस आधार पर चार्जशीट को रद्द कर दिया था कि निजी रूप से बच्चों की अश्लील सामग्री देखना या संग्रह करना बिना संचरण के अपराध नहीं माना जाता। माननीय उच्चतम न्यायालय ने कहा कि ऐसा विश्लेषण बाल संरक्षण कानूनों के उद्देश्य को कमजोर करता है और घिनौने शोषण अपराध को सामान्य बनाता है।
न्यायालय ने साथ ही महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए:
न्यायिक आदेश या निर्णय में “बाल अश्लीलता” या “बाल पोर्नोग्राफी” शब्द की जगह “बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार सामग्री” (सीएसईएएम) शब्द का उपयोग किया जाए।
व्यापक यौन शिक्षा कार्यक्रमों को लागू किया जाए।
पीड़ितों को सहायता सेवाएं और अपराधियों के लिए पुनर्वास कार्यक्रम प्रदान किए जाएं।
सार्वजनिक अभियानों के माध्यम से बाल यौन शोषण सामग्री की वास्तविकताओं और परिणामों के बारे में जागरूकता बढ़ाई जाए।
जोखिम वाले व्यक्तियों की शीघ्र पहचान तथा समस्याग्रस्त यौन व्यवहार (पीएसबी) वाले युवाओं के लिए उपचारात्मक रणनीतियां लागू की जाएं।
स्कूल-आधारित कार्यक्रमों के माध्यम से छात्रों को स्वस्थ संबंधों, सहमति और उचित व्यवहार के बारे में शिक्षित किया जाए।
सुझावों को सार्थक रूप देने के लिए भारत संघ द्वारा एक विशेषज्ञ समिति गठित की जाए।
संसद से पॉक्सो की धारा 15 की उपधारा (1) में संशोधन पर विचार किया जाए।
एआई आधारित अनुवाद परियोजना सुवास प्रकोष्ठ प्रयागराज और लखनऊ द्वारा माननीय मुख्य न्यायमूर्ति श्री अरुण भंसाली के संरक्षण और माननीय एआई असिस्टेड लीगल ट्रांसलेशन एडवाइजरी, ई-एएचसीआर एवं आईएलआर समिति के मार्गदर्शन में संचालित की जा रही है, जिसमें माननीय न्यायमूर्ति श्री अजित कुमार, अध्यक्ष तथा माननीय सदस्यगण न्यायमूर्ति श्री समीर जैन, न्यायमूर्ति श्री विक्रम डी. चौहान और न्यायमूर्ति श्री विवेक कुमार सिंह शामिल हैं।
इस अवसर की शोभा माननीय न्यायमूर्ति श्रीमती स्वरूपमा चतुर्वेदी की उपस्थिति ने बढ़ाई, जिन्होंने ऐसे प्रकरणों में अधिवक्ता के रूप में बच्चों के हित के लिए सफलतापूर्वक पैरवी की थी और इस प्रकाशन के लिए सहर्ष प्रस्तावना लिखी।
यह ई-पुस्तिका विधिक ज्ञान को लोकतांत्रित करने और न्यायिक विरासत को सुलभ बनाने का महत्वपूर्ण साधन बनेगी। ये पुस्तिकाएं इलाहाबाद उच्च न्यायालय की आधिकारिक वेबसाइट पर ‘ई इलाहाबाद उच्च न्यायालय निर्णय पत्रिका (e-AHCR)’ टैब के अंतर्गत निःशुल्क उपलब्ध होंगी।


